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एक महान विभूतिः हमारी साध्वी प्रमुखा

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तेरापंथ धर्मसंध एक जीवन्त एवं विकासशील धर्म-संघ है। इस धर्म संघ का साध्वी समाज भी समर्पित सेवाभावी, संघनिष्ठ एवं प्रबुद्ध है। गणाधिपति पूज्य गुरुदेव श्री तुलसी ने साध्वी समुदाय को हर क्षेत्र में बढ़ाया है। शिक्षा, सेवा, साधना के माध्यम से साध्वी समाज ने अपली विशिष्ट पहचान बनाई है। उसमें सबसे बड़ा योगदान है, असाधारण साध्वी प्रमुखा कनकप्रभा जी का। उनका दिव्य व्यक्तित्व-कर्तृत्व, निपुण नेतृत्व क्षमता अपने आप में अतुलनीय है।

जिनशासन में भगवान की आज्ञा सर्वोपरी है। वैसे हीं तेरापंथ धर्म संघ में गुरु आज्ञा सर्वोपरी है। विनीत शिष्य सदा गुरु आज्ञा एवं गुरु दृष्टि की अखंड आराधना करता है एवं सदैव गुरु के मान-सम्मान को अधिमान देता है। इसी विनम्रता और सहजता का अनुपम संगम है हम साध्वी प्रमुखा श्री जी में देखते हैं। आपने अपनी समग्र प्रतिमा को संघ सेवा में जिस तर समर्पित किया है, वह अपने आप में स्तुत्य है। आप गुरु आज्ञा को आगम आज्ञा है मानती है। अपनी बात श्री चरणों में निवेदित करके पुनः विनम्रता व समर्पण के साथ कहती है जैसे गुरुदेव की मर्जी हो।

विनय जिन शासन का मूल है आगमों में विनय की विशेष व्याख्या उपलब्ध है। सात प्रकार का विनय का भी उल्लेख है। "विणयो सत्तविहे पण्णते तं जहा- नाणविणओ, दंसणविणओ , चरित विणओ, मणविणओ, वति विणोओ, काय विणओ ओवायारिय विणओं (द अ चू पृष्ठ 14 -- ओववाइ‌यं सूत्र-40) हम देख सकते हैं महाश्रमणी साध्वी प्रमुखा श्री जी के जीवन में उपरोक्त सातों ही प्रकार जीवन व्यवहार में परिलक्षित होते हैं। इस विनम्र मुर्ति में अहंकार-ममकार से दूर सरलता हर पल झलकती है।

देवी स्वरूपा संघ महानिदे‌शिका प्रमुखा श्री जी में नेतृत्व करले की क्षमता नैसर्गिक तो है ही, इसमें विशिष्टता भी अर्जित की है। गुरुदेव के पवित्र आभावलय में प्रशासनिक क्षमताओं को सदैव बढ़ाया है। दृढ़ संकल्प शक्ति, स्व विवेक और मनोयोग से प्रगतिशील, प्रबुद्ध साध्वी वर्ग का सफलतम नेतृत्व करते हुए संघ को हर क्षेत्र में आगे बढ़ाया है।

आप साध्वियों के वर्ग प्रमुख (सिंघाड़े) और सह‌वर्ती सभी साध्वियां की परस्पर चित्र समाधि का विशेष रूप से ध्यान रखते हुए पंचाचार की साधन में सभी को स्थिर करती है। संघीय अपेक्षा के अनुरूप कला और कार्य कौशल में निरन्तरता लाने का भी प्रयास करती है। आपकी सूझबूझ और प्रबंधन का ही परिणाम है कि हमारे धर्मसंघ का साध्वी समाज शिक्षा, साहित्य, सेवा, कला आदि अनेक क्षेत्रों में आगे बढ़ा है। किस साध्वी का कहां कैसे उपयोग हो, किस साध्वी से क्या क्या कार्य कराये जा सकते हैं इस विधा में आप निष्णात है। अपने कुशल प्रशासनिक क्षमताओं से तेरापंथ के आचार्यों को निश्चिंत बनाने का सतत प्रयास आप सदैव करती रहती है।

सफलता का एक आधार है समय नियोजन । समय के अंकन की कला में जो निष्णात होते हैं, वे जिंदगी में सफलता के परचम फहराते हैं।

आदरास्पद असाधारण साध्वी प्रमुखा श्री जी प्रारम्भ से ही समय नियोजन एवं समय के सही सदुपयोग में निष्णात है। साधना की प्रारम्भिक भूमिका मुमुक्ष श्रेणी से लेकर वर्तमान तक आप हर क्षण का सार्थक उपयोग करती आई है। समय नियोजन की कला से ही आपने स्वाध्याय में इतनी तल्लीनता प्राप्त की है। इस तलस्पर्शी अध्ययन से कुशल प्रवचनकार एवं मौलिक साहित्य सृजक बनी हैं। यह हमारे धर्म संघ में एक मिशाल है। मुझे आपके जीवन का एक प्रेरक संस्मरण स्मृति में आ रहा है। गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी के मितावग्रह में एक बार सृजनात्मक साहित्य के सन्दर्भ में चर्चा शुरू हुई। तभी एक साध्वी ने पूज्य प्रवर से कर बद्ध अनुरोध किया - गुरुदेव, साध्वी प्रमुखा श्री के हाथ में तो सरस्वती है। ऐसा लिखते हैं कि फाईनल कॉपी ही बन जाती है, पुनः सम्पादन की अपेक्षा नहीं रहती है। साध्वी श्री जी की बात सम्पन्न हुई तो उस बात से सहमति प्रदान करते हुए गुरुदेव ने कहा-इनकी कलम और जुबान दोनों में ही सरस्वती है।

आचार्य श्रीने जिस दिन आपको साध्वी समाज का दायित्व सौंपा तब विकास की गति मन्द थी। आपने उसे गति प्रगति दी, तुलसी युग की तरुणिमा ने आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी के शासनकाल में भी अपनी इस प्रतिभा का और अधिक उपयोग किया। आचार्य श्री महायज्ञ जी ने एक प्रसंग में कहा- "इस युग में हमें जैसी साध्वी प्रमुखा की जरूरत थी, वैसी साध्वी प्रमुखा मिली है। अपने पुरुषार्थ की दिव्य दीप्ति से, व्यवहार से, विनम्रता से आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी की दृष्टि की भी अखंड आराधना की। आचाय की दृष्टि की पहचान और उसके अनुपालना में अपने श्रम का नियोजन इन्हें असाधारण बना देता है।

आचार्य श्रीमहाश्रमण जी आपकी सेवाओं से इतने प्रभावित है कि आपको "असाधारण साध्वी प्रमुखा "का सम्मान देकर अलंकरित किया है। आप भी आचार्य श्री महाश्रमणी जी को इतना बहु‌मान देती हैं, जिससे दोनों ही महान् विभूतियों का गौरव तो बढ़ा ही है। प्राचीन युग के गुरु शिष्य-शिष्या के अद्वैत स्वरूप के दर्शन होते हैं।