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ऐसे करें भगवान की भक्ति
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भगवान की भाव पूजा करने से मन को शांति मिलती है, जबकि द्रव्य पूजा केवल बाहरी रूप से संपन्न होती है। इसलिए भाव पूजा का महत्व अत्यधिक है, जिसका अर्थ है सच्चे मन से भक्ति करना। इसे हम निराकार पूजा भी कह सकते हैं, जहाँ अपने मन को ही मंदिर के रूप में स्थापित कर लिया जाता है।
प्राचीन ग्रंथों में एक श्लोक का उल्लेख मिलता है, जिसका आत्म चिंतन भगवान की भक्ति के समय करने से भक्त की मनोकामनाएं पूर्ण हो सकती हैं और दुखों का अंत संभव हो जाता है।
प्रातःकाल के शांत समय में स्वच्छ होकर एकांत में नीचे दिए गए श्लोक का आत्म चिंतन अवश्य करें। श्लोक इस प्रकार है:
अनायासेन मरणम्,
बिना देन्येन जीवनम् ।
देहान्ते तव सानिध्यम्,
देहि मे परमेश्वरम् ।।
इस श्लोक का अर्थ इस प्रकार है:
अनायासेन मरणम् का अर्थ: बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो, हम कभी भी लंबी बीमारी के कारण बिस्तर पर न पड़े और कष्ट उठाकर मृत्यु को प्राप्त न हों। हमारी मृत्यु ऐसे हो कि चलते-फिरते ही प्राण निकल जाएं।
बिना देन्येन जीवनम् का अर्थ: हमारा जीवन परवशता से मुक्त हो, अर्थात हमें कभी किसी का सहारा न लेना पड़े। हम कभी भी बेबस न हों। भगवान की कृपा से बिना किसी पर निर्भर हुए ही जीवन यापन हो जाए।
देहान्ते तव सानिध्यम् का अर्थ: जब भी हमारी मृत्यु हो, उस समय भगवान की सतत स्मृति हमारे अंतर्मन में बनी रहे। जैसे भीष्म पितामह की मृत्यु के समय स्वयं ठाकुरजी उनके सम्मुख खड़े थे और अपने दर्शन दिए थे।
देहि मे का अर्थ: हे परमेश्वर! ऐसा वरदान हमें देने की कृपा करना। यही सच्ची प्रार्थना है।